
Rajasthan आपणी हथाई न्यूज, राजस्थान हाईकोर्ट ने सहानुभूति के आधार पर मिली नौकरी और मृतक कर्मचारी के आश्रित माता-पिता की जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मृतक कर्मचारी की पत्नी की मासिक सैलरी का 25 प्रतिशत हिस्सा उसके बुजुर्ग सास-ससुर के खाते में जमा कराया जाए। इसके साथ ही मृतक कर्मचारी से जुड़े बकाया टर्मिनल लाभों का 50 प्रतिशत हिस्सा भी उसके माता-पिता को देने के निर्देश दिए गए हैं।

मामला अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) में कार्यरत एक टेक्निकल हेल्पर की मृत्यु से जुड़ा है। मृतक परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था। उसकी मौत के बाद उसकी पत्नी को सहानुभूति के आधार पर नौकरी दी गई थी। याचिकाकर्ता मृतक के माता-पिता का कहना था कि नौकरी देते समय यह बात सामने थी कि मृतक की पत्नी परिवार के अन्य सदस्यों, विशेष रूप से उसके बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करेगी।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, नौकरी मिलने के बाद महिला ने ससुराल छोड़ दिया और बाद में दूसरी शादी कर ली। आरोप था कि इसके बाद उसने अपने बुजुर्ग सास-ससुर की देखभाल करना भी बंद कर दिया। परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर बताई गई, क्योंकि मृतक के दो अन्य बेटे बेरोजगार थे और वे माता-पिता की पर्याप्त आर्थिक मदद करने की स्थिति में नहीं थे। इसके बाद मृतक के माता-पिता ने उसकी पत्नी की सैलरी और मृतक के बकाया टर्मिनल लाभों में हिस्सा देने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मामले की सुनवाई जस्टिस आनंद शर्मा की बेंच ने की। प्रतिवादी महिला की ओर से दलील दी गई कि ससुराल में उसके साथ उचित व्यवहार नहीं किया जा रहा था, जिसके कारण उसे वहां से जाना पड़ा और उसने दूसरी शादी कर ली। यह भी तर्क दिया गया कि मृतक के माता-पिता की देखभाल उनके दूसरे बेटे कर सकते हैं, इसलिए महिला की सैलरी या टर्मिनल लाभों में से हिस्सा देना उस पर अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने सहानुभूति के आधार पर नियुक्ति के उद्देश्य को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि ऐसी नियुक्ति का मूल उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को अचानक आय के स्रोत से वंचित होने के बाद आर्थिक संकट से उबारना है। परिवार का अर्थ केवल विधवा से नहीं है, बल्कि कानून के अनुसार मृतक कर्मचारी के माता-पिता और अन्य पात्र आश्रित भी इसमें शामिल हो सकते हैं।
कोर्ट ने यह भी माना कि सहानुभूति के आधार पर नौकरी प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल की जिम्मेदारी जुड़ी होती है। इसी संदर्भ में कोर्ट ने ‘भगवान सिंह बनाम सुपरिटेंडेंट इंजीनियर, पावस, अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड’ मामले में दिए गए पूर्व निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि सहानुभूति के आधार पर नौकरी पाने वाला लाभार्थी परिवार के अन्य आश्रित सदस्यों की अनदेखी नहीं कर सकता।
मामले के तथ्यों और महिला के व्यवहार को देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि प्रतिवादी की मासिक सैलरी का 25 प्रतिशत हिस्सा काटकर सीधे मृतक कर्मचारी के माता-पिता यानी याचिकाकर्ताओं के बैंक खाते में जमा कराया जाए। साथ ही मृतक कर्मचारी के बकाया टर्मिनल लाभों में से 50 प्रतिशत हिस्सा भी याचिकाकर्ताओं को जारी करने का निर्देश दिया गया।
इस आदेश के साथ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहानुभूति के आधार पर सरकारी नौकरी केवल व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य मृतक कर्मचारी पर आश्रित परिवार को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना भी है। इसी आधार पर कोर्ट ने मृतक के बुजुर्ग माता-पिता के हित में सैलरी और टर्मिनल लाभों में हिस्सा देने का निर्देश देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।


