

आपणी हथाई न्यूज, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है, जबकि एशिया के कई देशों की मुद्राओं ने हाल के समय में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। चीन की युआन, मलेशिया की रिंगिट और पाकिस्तान की रुपया करंसी में अलग-अलग आर्थिक कारणों से स्थिरता या मजबूती देखने को मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक निवेश, ब्याज दरों में बदलाव, निर्यात और विदेशी मुद्रा भंडार जैसी स्थितियां एशियाई देशों की करंसी पर सीधा असर डाल रही हैं।
भारत में डॉलर की बढ़ती मांग, कच्चे तेल के भारी आयात और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर तेल आयात करता है और इसका भुगतान डॉलर में होता है। जब डॉलर मजबूत होता है तो भारत का आयात बिल बढ़ जाता है, जिससे रुपया कमजोर पड़ता है।
चीन की युआन क्यों बनी मजबूत
चीन की करंसी युआन को वहां के मजबूत निर्यात और सरकारी नियंत्रण का सहारा मिला है। चीन दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक देशों में शामिल है और वैश्विक व्यापार में उसकी मजबूत पकड़ बनी हुई है। चीन का केंद्रीय बैंक बाजार में हस्तक्षेप कर युआन को अत्यधिक गिरने से रोकता है। इसके अलावा अमेरिका-चीन व्यापार तनाव के बावजूद चीन की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और विदेशी मुद्रा भंडार ने उसकी मुद्रा को स्थिर बनाए रखने में मदद की है।
मलेशिया की रिंगिट में सुधार के कारण
मलेशिया की रिंगिट को पाम ऑयल, पेट्रोलियम और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्यात से मजबूती मिली है। वैश्विक बाजार में कमोडिटी कीमतों में सुधार और विदेशी निवेशकों की वापसी ने मलेशियाई अर्थव्यवस्था को सहारा दिया। इसके साथ ही वहां की सरकार ने वित्तीय अनुशासन और निवेश बढ़ाने पर जोर दिया, जिससे रिंगिट में स्थिरता आई।
पाकिस्तान की मुद्रा भी स्थिर
पाकिस्तान की करंसी लंबे समय तक आर्थिक संकट से जूझती रही, लेकिन हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से राहत पैकेज, आयात नियंत्रण और विदेशी सहायता मिलने से पाकिस्तानी रुपये में कुछ स्थिरता देखने को मिली है। हालांकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अभी भी महंगाई, कर्ज और विदेशी मुद्रा संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, लेकिन सरकारी नियंत्रण और डॉलर की उपलब्धता बढ़ने से वहां की मुद्रा में गिरावट कुछ हद तक थमी है।
भारत के लिए फायदे
कमजोर रुपया भारत के निर्यातकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। आईटी, फार्मा, टेक्सटाइल और विदेशों में सेवाएं देने वाली कंपनियों को डॉलर में अधिक कमाई होती है। विदेशों से आने वाली रेमिटेंस का मूल्य भी बढ़ जाता है, जिससे भारतीय परिवारों को अधिक रुपये मिलते हैं।
भारत के लिए नुकसान
दूसरी ओर कमजोर रुपया पेट्रोल-डीजल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, मशीनरी और अन्य आयातित सामान को महंगा बना देता है। इससे महंगाई बढ़ती है और आम जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। विदेश में पढ़ाई और यात्रा भी महंगी हो जाती है। उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने से बाजार पर भी असर पड़ सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत यदि निर्यात बढ़ाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और आयात पर निर्भरता कम करने में सफल रहता है तो रुपये को मजबूती मिल सकती है। फिलहाल वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और अमेरिकी डॉलर की चाल भारतीय मुद्रा के लिए सबसे बड़ा निर्णायक कारक बनी हुई हैं।


