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Rajasthan : राजस्थान की सुरीली पहचान ‘तगाराम भील’ को मिला ‘पद्मश्री’ सम्मान, कैसा रहा तगाराम भील का अब तक का सफर ! पढें पूरी खबर

आपणी हथाई न्यूज, राजस्थान के जैसलमेर जिले के मूलसागर गांव से निकलकर लोक संगीत की अनूठी धुनों को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध अलगोजा वादक तगाराम भील को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है। लोक संगीत और पारंपरिक अलगोजा वादन को जीवित रखने में उनके दशकों लंबे योगदान को इस सम्मान के जरिए राष्ट्रीय पहचान मिली है।

17 अप्रैल 1960 को मूलसागर गांव में जन्मे तगाराम भील का संगीत से जुड़ाव बचपन से ही शुरू हो गया था। महज सात साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ मवेशी चराते हुए अलगोजा बजाना सीखना शुरू किया। लगातार अभ्यास और साधना के दम पर उन्होंने इस लोक वाद्य में अद्भुत महारत हासिल की। थार क्षेत्र का प्रसिद्ध वाद्य अलगोजा शीशम और कैर की लकड़ी से तैयार किया जाता है, जिसमें दो बांसुरियों को एक साथ विशेष तकनीक से बजाया जाता है।

तगाराम भील को पहली बड़ी पहचान वर्ष 1981 में मिली, जब उन्होंने जैसलमेर के गोपा चौक में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और यहीं से उनके लोक संगीत सफर को नई दिशा मिली। इसके बाद उन्हें देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेशी मेहमानों के सामने भी अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर मिला।

उन्होंने उस्ताद अकबर खान और उस्ताद अर्बा संगीत संस्थान से संगीत की शिक्षा हासिल की। तगाराम ने राजस्थान दिवस, डेजर्ट फेस्टिवल जैसलमेर, कैमल फेस्टिवल बीकानेर, पुष्कर मेला, मारवाड़ महोत्सव और जयपुर-उदयपुर के कई बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में प्रस्तुति देकर लोक संगीत को नई पहचान दिलाई। इसके साथ ही फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी, जापान, सिंगापुर और अमेरिका जैसे देशों में भी उन्होंने राजस्थान की लोक संस्कृति की गूंज पहुंचाई।

लोक कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें महारावल गिरधर पुरस्कार, मरूधरा पुरस्कार, आदिवासी सम्मान, अमृत गंगा पुरस्कार और गौरव सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। पद्मश्री मिलने के बाद राजस्थान के लोक कलाकारों और संगीत प्रेमियों में खुशी और गर्व का माहौल है।

 



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