

Bikaner आपणी हथाई न्यूज, दीपावली का त्योहार खुशियों, रोशनी और आपसी भाईचारे का प्रतीक है, लेकिन बीकानेर में इसी त्योहार की आड़ में एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जो शहर के सामाजिक ताने-बाने और युवा पीढ़ी के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। परम्परा के नाम पर शहर के कई चौक-चौराहों और गलियों में जुए का खेल शुरू होने की चर्चाएं हैं। चिंता की बात यह है कि इस माहौल में शहर का Gen-Z यानी नई पीढ़ी भी तेजी से आकर्षित होती नजर आ रही है। नत्थूसर गेट के अंदर शहर के कई इलाकों में दीपावली के दिनों में जुए के खेल की गतिविधियां शुरू होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। सवाल यह है कि क्या त्योहार मनाने के नाम पर जुए को सामाजिक परम्परा का जामा पहनाना उचित है? आपकों बता दे कि इस बड़ी समस्या को लेकर पश्चिम विधायक जेठानंद व्यास एसपी को कुछ दिन पहले एक खत लिख चुके है।

परम्परा के नाम पर गलत राह पर युवा पीढ़ी

कभी दीपावली का उत्सव परिवारों को जोड़ने और खुशियां बांटने का माध्यम हुआ करता था, लेकिन अब जुए को परम्परा बताकर सामान्य बनाने की प्रवृत्ति चिंता बढ़ा रही है। खासकर युवा पीढ़ी के लिए यह बेहद खतरनाक संकेत है। शुरुआत में मनोरंजन और दोस्तों के बीच थोड़ी रकम लगाने से शुरू होने वाला यह शौक कब लत में बदल जाए, इसका अंदाजा भी नहीं लग पाता।
आज का Gen-Z पहले ही मोबाइल गेमिंग, ऑनलाइन बेटिंग,नशा और सट्टेबाजी जैसे आकर्षणों से घिरा हुआ है। ऐसे में यदि शहर की गलियों और चौक-चौराहों में भी जुए का माहौल तैयार होता है तो इसका असर सीधे युवाओं की सोच, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक जीवन पर पड़ सकता है।
जुए से सट्टे और नशे तक पहुंचने का खतरा
शहर में युवाओं के बीच जुआ, सट्टेबाजी और नशे की ओर बढ़ते रुझान को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। जुए और सट्टे में जल्दी पैसा कमाने की मानसिकता युवाओं को गलत संगत और आर्थिक जोखिमों की तरफ धकेल सकती है। वहीं नशे की बढ़ती प्रवृत्ति इस समस्या को और गंभीर बना देती है।
एक युवा जब मेहनत और हुनर के बजाय किस्मत के सहारे पैसा कमाने के सपने देखने लगता है, तो उसके जीवन की दिशा बदलने में देर नहीं लगती। कर्ज, पारिवारिक तनाव, मानसिक दबाव और अपराध की ओर बढ़ते कदम इसी तरह की आदतों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
आखिर पुलिस की निगाह कहां है?
सबसे बड़ा सवाल पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। यदि शहर के प्रमुख चौक-चौराहों और गलियों में इस तरह की गतिविधियां संचालित होने की शिकायतें हैं, तो पुलिस की निगरानी और गश्त पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या पुलिस को इन गतिविधियों की जानकारी नहीं है? क्या त्योहारों के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल औपचारिक गश्त तक सीमित रह गई है? आखिर सार्वजनिक स्थानों पर जुए और सट्टेबाजी की शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई कब होगी? पुलिस प्रशासन को चाहिए कि वह केवल शिकायत आने का इंतजार न करे, बल्कि संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ाए, जुए और सट्टेबाजी की शिकायतों की निष्पक्ष जांच करे तथा युवाओं को इस दलदल से बचाने के लिए ठोस कदम उठाए।
रोशनी के त्योहार में अंधेरे की ओर बढ़ते कदम
बीकानेर की पहचान उसकी संस्कृति, परम्पराओं और सामाजिक सौहार्द से है। ऐसे में जरूरी है कि परम्परा और गलत गतिविधियों के बीच अंतर समझा जाए। दीपावली पर खुशियां बांटने की परम्परा को जुए की आड़ में बदनाम नहीं होने देना चाहिए। शहर के अभिभावकों, समाज के जिम्मेदार लोगों, जनप्रतिनिधियों और पुलिस प्रशासन को इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा। सवाल सिर्फ जुए का नहीं, बल्कि उस युवा पीढ़ी का है जिसके हाथों में शहर का भविष्य है।



