


आपणी हथाई Bikaner न्यूज,साहित्यिक पत्रकारिता भाषा के निर्माण और उसके मानक स्वरूप को स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य करती है। एक संपादक के कंधों पर भाषा की संरचना और उसकी स्वायत्तता को सुरक्षित रखने की दोहरी जिम्मेदारी होती है। इसलिए उसे भाषा, साहित्य और व्याकरण का गहन ज्ञान होना आवश्यक है। वर्तमान समय में साहित्यिक पत्रकारिता के सामने सोशल मीडिया एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, क्योंकि सोशल मीडिया जहां हिंसा और उत्तेजना को बढ़ावा देता है, वहीं साहित्यिक पत्रकारिता अहिंसा, संवेदनशीलता और सकारात्मक मूल्यों का पोषण करती है। यही कारण है कि आज भी लोग सोशल मीडिया की अपेक्षा साहित्यिक पत्रकारिता पर अधिक विश्वास करते हैं।
ये विचार साहित्य अकादेमी के राजस्थानी संयोजक एवं प्रख्यात कवि-आलोचक प्रो. (डॉ.) अर्जुनदेव चारण ने साहित्य अकादेमी तथा डॉ. भगवानदास किराड़ू नवीन समिति के संयुक्त तत्वावधान में बीकानेर में आयोजित ‘राजस्थानी साहित्यिक पत्रकारिता’ विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता भाषा के मानक स्वरूप को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाओं के इतिहास और प्रकाशन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समाज में युवा रचनाकारों को आगे बढ़ाने में साहित्यिक पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए राजस्थानी पत्र-पत्रिकाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन की आवश्यकता है।
साहित्य अकादेमी के उपसचिव एन. सुरेश बाबू ने सभी रचनाकारों का स्वागत करते हुए कहा कि राजस्थानी एक समृद्ध और स्वतंत्र भाषा है, जिसे संवैधानिक मान्यता मिलनी ही चाहिए।
संगोष्ठी संयोजक नगेंद्र नारायण किराड़ू ने बताया कि प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रतिष्ठित कवि, आलोचक एवं संपादक डॉ. कुंजन आचार्य ने की। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है, इसलिए प्रदेश के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाओं के डिजिटल स्वरूप में उपलब्ध होने की आवश्यकता पर बल देते हुए उनके प्रकाशन और डाक व्यय में लगातार बढ़ रही लागत पर भी चिंता व्यक्त की।इस सत्र में युवा रचनाकार महेन्द्रसिंह नरावत ने ‘राजस्थानी साहित्यिक पत्रकारिता की सामाजिक भूमिका’ विषय पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया।
द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रतिष्ठित कवि-आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित ने की। उन्होंने राजस्थानी साहित्यिक पत्रकारिता का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता समाज में वैचारिक चेतना का सशक्त माध्यम है। इस अवसर पर उन्होंने राजस्थानी शोध एवं साहित्यिक पत्रिकाओं—जागती-जोत, राजस्थली, कथेसर, बिणजारो, परम्परा और वैचारिकी—की विस्तृत समीक्षा करते हुए उनके महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया।
युवा कवि, कथाकार एवं संपादक डॉ. नमामी शंकर आचार्य ने ‘राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाओं में संपादक की समस्याएं’ विषय पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया। वहीं राजस्थानी रचनाकार एवं संपादक धीरेंद्र आचार्य ने ‘राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाएं और बाजार’ विषय पर अपने शोध-पत्र में विस्तार से बताया कि वर्तमान समय में बाजार किस प्रकार राजस्थानी भाषा, साहित्य, संस्कृति और लोकजीवन को प्रभावित कर रहा है।
समापन समारोह की अध्यक्षता प्रतिष्ठित कवि, कथाकार एवं संपादक रामस्वरूप किसान ने की। उन्होंने कहा कि संपादन का कार्य लेखन से भी अधिक कठिन होता है, क्योंकि एक संपादक को लेखक की रचना के साथ गंभीरता से काम करना पड़ता है। उन्होंने ‘कथेसर’ पत्रिका से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि संपादक वास्तव में लेखक और पाठक के बीच एक मजबूत सेतु का कार्य करता है।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रतिष्ठित कवि, पत्रकार एवं संपादक डॉ. राजेश कुमार व्यास ने कहा कि राजस्थानी साहित्यिक पत्रकारिता में अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाएं प्रकाशित हुईं, लेकिन विभिन्न समस्याओं के कारण उनमें से कई बंद हो गईं। उन्होंने कहा कि एक संपादक को कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं, लेकिन यदि गुणवत्तापूर्ण सामग्री और आर्थिक मजबूती हो तो कोई भी पत्रिका बंद नहीं होती। उन्होंने यह भी कहा कि एक कुशल संपादक के लिए भाषाई और सांस्कृतिक शब्दावली की गहरी समझ होना अत्यंत आवश्यक है।
अंत में संगोष्ठी संयोजक नगेंद्र नारायण किराड़ू ने साहित्य अकादेमी, सभी उपस्थित रचनाकारों और मातृभाषा प्रेमियों का आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी के सभी चारों सत्रों का संचालन कवि एवं कथाकार संजय पुरोहित ने किया।
इस अवसर पर प्रतिष्ठित रचनाकार मालचंद तिवाड़ी, कमल रंगा, डॉ. प्रशांत बिस्सा, डॉ. अजय जोशी, डॉ. नृसिंह बिनाणी, अनुराग हर्ष, अब्दुल शकुर सिसोदिया, इसरार हसन कादरी, असद अली असद, प्रशांत कुमार जैन, डॉ. गौरीशंकर प्रजापत, योगेंद्र कुमार पुरोहित, राजेश चौधरी, हिमांशु टाक, सत्यनारायण सिंह राजपुरोहित, सुभांगी सुथार, नंदनी श्रीमाली, जागृति भोजक, विनिता शर्मा, उत्कर्ष किराड़ू, अरविंद भादाणी, शिव दाधीच, उमा शर्मा और अशोक आचार्य सहित अनेक साहित्यकार, मातृभाषा प्रेमी एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।


