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लम्पी स्किन डिजीज को लेकर अलर्ट! Rajasthan के कई जिलों में फैला रोग, गोवंश बचाने के लिए जारी हुई एडवाइजरी

आपणी हथाई न्यूज, राज्य के भरतपुर, डीग, अलवर, धौलपुर और दौसा आदि पूर्वी जिलों में लम्पी चर्म रोग के फैलने की सूचनाएँ प्राप्त हुई हैं। इन जिलों में गौवंश में लम्पी स्किन डिजीज के फैलने की सूचनाओं के बाद राजस्थान गो सेवा आयोग ने राज्य में एड एडवाइजरी जारी की है।

राजस्थान गो सेवा आयोग की सचिव डॉ. अनिता अग्रवाल ने बताया कि यह एक विषाणु जनित संक्रामक रोग है, जो मुख्य रूप से गौवंश को प्रभावित करता है। गर्म एवं नमी वाले मौसम में यह रोग मच्छरों, मक्खियों, चीचड़ों, दूषित पानी, लार और चारे के माध्यम से अत्यंत तेजी से फैलता है। इस रोग के मुख्य लक्षण में गौवंश को 104 से 106 डिग्री तक तेज बुखार हो जाता है। त्वचा पर मोटी-मोटी गाड़ियाँ (गाँठें) बन जाती हैं। पशु आहार नहीं ले पाता, जिससे वह अत्यधिक कमजोर हो जाता है। दुधारू गोवंश का दूध सूख जाता है या उसमें भारी कमी आ जाती है।

उन्होंने बताया कि गोवंश रोग की रोकथाम के लिए साईपरमैथिन, पलूमैथिन या एमिट्राज का छिड़काव तथा आइवरमैक्टिन के टीके का उपयोग पशु चिकित्सक की परामर्श के बाद करे जिससे बाहरी परजीवियों पर नियंत्रण पाया जा सके। गोवंश को थोड़ा विलम्ब से गोशाला से बाहर लाएं और सायं काल से थोड़ा पहले ही गोशाला में बांध दें जिससे मच्छरों के प्रकोप से बचा जा सके। गोवंश को 24 घंटे खुले में न रखें। गोशाला के आस-पास उगे खरपतवार को काट दें, जिससे उसमें मच्छर न पनप पाएं। गोशाला में सफाई रखें और नियमित तौर पर गोबर को बाहर निकाल दें। आमतौर पर मक्ख्यिाँ गोबर पर ही पनपती है इसलिए यह जरूरी है कि खाद के लिए बनाए जाने वाले गोबर के ढेर को गोशाला से अलग दूर बनाए उसके चारों ओर ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव करें।

गोशाला की नालियों को साफ रखें। सप्ताह में दो बार ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव करें। सायं काल में गोशाला के बाहर नीम के पत्ते जलाकर धुंआ करें ताकि मक्खी, मच्छर भाग जाएं। गोशाला को खाली करके कीटनाशक दवाई जैसे साइपरमैथिन 3 मिली. प्रति 1 ली. पानी के घोल का छिड़काव करें ताकि बाहरी परजीवियों पर नियंत्रण पाया जा सके। गोशाला की दीवार पर चूने की पुताई करें। गोशाला की खिडकियों पर जाली लगवाएं। गोशाला का फर्श अगर कच्चा हो तो उस पर चूने का छिड़काव करें। पक्का फर्श हो तो पोटेशियम परमैग्नेट के घोल से सफाई करें। एलएसडी एक विषाणु जनित रोग है, जिसका निश्चित उपचार संभव नहीं है। औषधियां एक स्तर तक ही प्रभावी हैं अतः रोग के नियंत्रण एंव रोकथाम हेतु गोपालकों को सामान्य घरेलू उपचार जैव सुरक्षा उपचार आदि उपाय अपनाए जाने चाहिए।

उन्होंने बताया कि पशु में रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देने पर बीमार गोवंश को अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग कर दें उसे खुले में चरने के लिए न छोड़ें। बीमार गोवंश की सूचना नजदीकी पशु चिकित्सालय को दें, जिससे उपचार शुरू किया जा सके। स्वस्थ गोवंश को चारा-पानी देने के बाद ही बीमार गोवंश को खाने के लिए चारा दें। बीमार गोवंश के बचे हुए चारे को जला दें। स्वस्थ गोवंश का दैनिक कार्य पहले करें।

संक्रमित गोशाला में अन्य लोगों को जाने को सीमित करे। संक्रमित गोशाला को कीटाणुरहित करने के लिए सोडियम हाइपोक्लोराइड के दो से तीन प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

मृत गोवंश के संपर्क में रही वस्तुओं व स्थान को लाल दवा व फिनाइल आदि से कीटाणुरहित करें।
चर्म रोग से मृत गोवंश को लगभग 1.5 मी. गहरे गड्ढे में चूने या नमक के साथ दबाएं। रोगग्रस्त क्षेत्र में गोवंश की आवाजाही रोकें।

जिले के सभी पशु चिकित्सा अधिकारियों और गोशालाओं के अध्यक्षों/मंत्रियों को एडवाइजरी की अक्षरशः पालना सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।



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