

Bikaner आपणी हथाई न्यूज, बीकानेर में इन दिनों प्रदूषण और सफाई व्यवस्था शहर की बड़ी समस्याओं में शामिल हैं। एक ओर कई इलाकों में कचरा संग्रहण और सफाई व्यवस्था को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर हवा में मौजूद धूल और सूक्ष्म प्रदूषक कण भी चिंता बढ़ा रहे हैं। शहर की आबोहवा और स्वच्छता का आकलन करने पर सामने आता है कि समस्या केवल सड़कों पर बिखरे कचरे तक सीमित नहीं है, बल्कि वायु गुणवत्ता पर भी गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।

उपलब्ध वायु गुणवत्ता आंकड़ों के अनुसार, 20 अक्टूबर 2026 को बीकानेर का अमेरिकी मानक पर आधारित एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 168 दर्ज किया गया था। यह स्तर स्वास्थ्य के लिहाज से नुकसानदेह श्रेणी में आता है। इसी दौरान हवा में PM2.5 की मात्रा 89 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और PM10 की मात्रा 193 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की गई। ये आंकड़े बताते हैं कि शहर की हवा में बारीक और अपेक्षाकृत बड़े धूल कणों की मौजूदगी चिंता का विषय थी। हालांकि, ये 20 अक्टूबर की रीडिंग हैं, 22 अक्टूबर के लाइव आंकड़े नहीं।

सफाई व्यवस्था पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल
बीकानेर में सफाई व्यवस्था को लेकर अक्टूबर में पार्षदों ने नगर निगम प्रशासन के सामने नाराजगी जताई थी। 9 अक्टूबर को पार्षदों के विरोध प्रदर्शन के दौरान निगम आयुक्त कार्यालय के बाहर कचरा डालकर विरोध दर्ज कराने की खबर सामने आई थी। पार्षदों ने आरोप लगाया था कि निर्धारित संख्या में ऑटो टिपर और ट्रैक्टर नहीं पहुंचने के कारण कई वार्डों में सफाई प्रभावित हो रही है। इसके बाद 12 अक्टूबर को भी सफाई व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर पार्षदों ने धरना दिया था।
16 अक्टूबर को नगर निगम की साधारण सभा में भी सफाई व्यवस्था का मुद्दा उठा। बैठक में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, सफाई ठेकेदार की ओर से आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं कराने के कारण व्यवस्था प्रभावित हुई थी। बोर्ड ने सफाई व्यवस्था सुधारने, ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई करने और सफाईकर्मियों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव पर चर्चा की। इससे स्पष्ट है कि शहर में कचरा संग्रहण और नियमित सफाई की व्यवस्था को लेकर प्रशासन के सामने चुनौती बनी हुई है।
रेगिस्तानी शहर में धूल भी प्रदूषण की बड़ी वजह
बीकानेर की भौगोलिक स्थिति के कारण धूल वायु प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण कारक है। अक्टूबर 2026 में प्रकाशित एक शोध अध्ययन में शहर के तीन निगरानी केंद्रों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के मुताबिक, PM10 का मौसमी औसत गर्मियों में 136 से 168, मानसून में 100 से 120 और सर्दियों में 190 से 228 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच रहा। अध्ययन में यातायात मार्गों, औद्योगिक एवं व्यावसायिक क्षेत्रों और खनन प्रभावित इलाकों में धूल कणों की अधिकता सामने आई। ये शोध के मौसमी औसत हैं, वर्तमान दिन की रीडिंग नहीं।
PM2.5 ऐसे बेहद बारीक कण हैं, जो सांस के साथ फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। वहीं PM10 में सड़क की धूल, मिट्टी और अन्य अपेक्षाकृत बड़े कण शामिल होते हैं। वाहनों की आवाजाही, निर्माण कार्य, खुले में पड़ी मिट्टी, कचरे का अनुचित निस्तारण और तेज हवा से उड़ने वाली धूल स्थानीय परिस्थितियों में प्रदूषण बढ़ा सकती है।
प्रदूषण घटाने के लिए क्या करना जरूरी?
बीकानेर में वायु प्रदूषण कम करने के लिए केवल सड़कों की सफाई पर्याप्त नहीं होगी। नियमित कचरा संग्रहण, खुले में कचरा डालने पर रोक, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, सड़कों की प्रभावी सफाई, जरूरत के अनुसार पानी का छिड़काव और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन की निगरानी जरूरी है। साथ ही, नगर निगम और राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल को उपलब्ध निगरानी आंकड़ों के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर कार्रवाई करनी चाहिए।
वायु गुणवत्ता खराब होने पर बच्चों, बुजुर्गों और सांस या हृदय संबंधी बीमारियों से प्रभावित लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। प्रदूषण अधिक होने के दौरान खुले में भारी शारीरिक गतिविधियां सीमित करना और सांस लेने में परेशानी होने पर चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
अब सवाल यह है कि बीकानेर में सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने और हवा में मौजूद धूल व प्रदूषक कणों को कम करने के लिए जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी कार्रवाई होती है। शहरवासियों को स्वच्छ सड़कें और सांस लेने के लिए साफ हवा उपलब्ध कराना नगर निगम तथा संबंधित पर्यावरणीय एजेंसियों की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
आंकड़ों से जुड़ी जरूरी बात
इस खबर में उपलब्ध नवीनतम सत्यापित रीडिंग 20 अक्टूबर 2026 की है। 22 अक्टूबर की लाइव रीडिंग की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, इसलिए उसे आज का आंकड़ा बताना उचित नहीं होगा। इसके अतिरिक्त, ऊपर दिया गया AQI 168 अमेरिकी सूचकांक पर आधारित है। भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के राष्ट्रीय AQI सूचकांक की श्रेणियां अलग हैं। भारत के मानक पर सही श्रेणी बताने के लिए उसी समय की आधिकारिक रीडिंग देखना जरूरी है।



