आपणी हथाई न्यूज, नगर निगम चुनाव में वार्ड नंबर 72 आज एक राजनीतिक हालात तेजी से बदल रहे है। भाजपा पार्टी से टिकट कटने के बाद उपजे भारी रोष और सर्वसमाज के समर्थन के बीच निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरीं निशा पारीक के तीखे और तार्किक बयानों ने अब बीकानेर के पूरे राजनीतिक माहौल में भूचाल ला दिया है।
निशा पारीक का सीधा प्रहार: “बड़े नेताओं के लिए अलग नियम और कार्यकर्ताओं के लिए अलग?”
निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल करने के बाद जब निशा पारीक से बातचीत की गई, तो उन्होंने पार्टी के खोखले तर्कों की धज्जियां उड़ाते हुए एक अत्यंत तीखा और वजनदार सवाल खड़ा किया:
“जब राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री आदरणीय वसुंधरा राजे जी को ‘जाट समाज की बहू’ मानकर पार्टी वोट मांग सकती है और राजपूत तथा जाट समीकरणों को साधकर सत्ता हासिल कर सकती है… तो फिर वार्ड 72 में 20 साल से समर्पित बहू को यह कहकर कैसे नकारा जा सकता है कि वह ‘ओबीसी की बेटी’ है? मैं पारीक समाज की बहू हूँ और सेन समाज की बेटी हूँ। अगर पार्टी बड़ी सोच रखती, तो उसे पारीक और सेन समाज के साथ-साथ पूरे सर्वसमाज का अभूतपूर्व समर्थन मिलता। शीर्ष स्तर पर जो नीति सही है, वह कार्यकर्ता के स्तर पर गलत कैसे हो सकती है?”
निशा पारीक ने बेहद भावुक और आक्रोशित लहजे में कहा कि पार्टी अपने ही मूल मंत्र ‘सामाजिक समरसता’ को पूरी तरह भूल चुकी है।
सर्वसमाज के स्वाभिमान की लड़ाई बना वार्ड 72
भाजपा नेतृत्व ने जिस फैसले को एक साधारण टिकट काटना समझा था, वह अब स्वाभिमान का मुद्दा बन चुका है। वार्ड 72 में केवल पारीक समाज ही नहीं, बल्कि लगभग 1500 से 2000 की संख्या में मौजूद ओबीसी मतदाता— जिनमें सुथार, सुनार, जाट, नाई (सेन), धोबी समाज के साथ-साथ एससी, एसटी और अल्पसंख्यक वर्ग शामिल हैं— पार्टी की इस जातिगत सोच से आहत हैं। वार्ड के आम मतदाताओं का कहना है कि जो महिला 20 वर्षों से क्षेत्र के सुख-दुख में बहू बनकर खड़ी रही, उसकी पहचान पर इस तरह का जातिगत ठप्पा लगाना पूरे वार्ड का अपमान है।
पार्टी के गले की फांस बना निर्णय, अन्य वार्डों में भी बिगाड़ेगा खेल
राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है कि बीकानेर के जिस वार्ड 72 को एक पार्टी अपनी जेब में मानकर चलती थी, वहाँ अब निर्दलीय प्रत्याशी निशा पारीक लगातार बेहतर प्रयास कर रही है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस विवाद की लपटें केवल वार्ड 72 तक सीमित नहीं हैं। ‘बेटी-बहू’ और ‘जातिगत पक्षपात’ का यह मुद्दा अब बीकानेर नगर निगम के अन्य वार्डों में भी तेजी से असर दिखा रहा है।


