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पॉलिटिक्स : भाजपा के गढ़ में ही ‘कमल’ मुरझाया! बड़े चेहरों से लेकर संगठन के धुरंधरों तक को मिली शिकस्त

पॉलिटिक्स आपणी हथाई न्यूज, बीकानेर नगर निगम चुनाव-2026 के नतीजों ने भाजपा के लिए कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी के बड़े नेताओं और संगठन से जुड़े प्रमुख चेहरों की हार ने राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। खास बात यह है कि शहर की पहली नागरिक और निवर्तमान महापौर सुशीला कंवर राजपुरोहित भी अपना वार्ड नहीं बचा पाईं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब बड़े नेता अपने ही वार्ड में जीत नहीं दिला पाए, तो पूरे शहर की चुनावी रणनीति कितनी कारगर रही?

महापौर की हार ने बढ़ाई चिंता

निवर्तमान महापौर सुशीला कंवर राजपुरोहित की हार को भाजपा के लिए सबसे बड़ा झटका बताया जा रहा है। शहर की पहली नागरिक और निवर्तमान महापौर का अपने ही वार्ड से चुनाव हारना पार्टी के लिए गंभीर राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। हालांकि, हार के वास्तविक कारणों को लेकर अलग-अलग चर्चाएं हैं।

शहर संगठन की पूरी टीम पर भी उठे सवाल

चुनाव परिणामों में भाजपा के शहर संगठन से जुड़े कई प्रमुख नाम भी हार गए। इनमें शहर भाजपा अध्यक्ष सुमन छाजेड़ के वार्ड में भाजपा की हार, जिला उपाध्यक्ष सरिता नाहटा की हार, भाजपा कोषाध्यक्ष गोपाल अग्रवाल की हार तथा उपाध्यक्ष दीपक पारीक, किशन चौधरी और अशोक प्रजापत की हार शामिल है। संगठन के इतने प्रमुख चेहरों के चुनाव हारने से पार्टी की चुनावी तैयारियों और जमीनी पकड़ पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मंडल अध्यक्षों का भी नहीं चला ‘संगठन वाला जादू’

भाजपा के विभिन्न मंडलों से जुड़े नेताओं के परिवारों को भी चुनाव में झटका लगा। जस्सूसर मंडल के पूर्व अध्यक्ष मुकेश ओझा, नया शहर मंडल अध्यक्ष विशाल गोलछा, मुक्ताप्रसाद नगर मंडल अध्यक्ष कपिल शर्मा की माता संतोष शर्मा और शिवबाड़ी मंडल अध्यक्ष नरेंद्र सिंह की हार का उल्लेख किया गया है। इससे यह चर्चा भी तेज हुई कि संगठन के स्थानीय समीकरण चुनावी मैदान में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए।

वरिष्ठ नेताओं के परिवार भी नहीं बचा पाए चुनावी समीकरण

चुनाव में वरिष्ठ नेताओं के परिवारों को भी हार का सामना करना पड़ा। वरिष्ठ नेता मोहन सुराणा की पत्नी मधु सुराणा, उपमहापौर राजेंद्र पंवार की रिश्तेदार कृष्णा, युवा मोर्चे के पूर्व जिलाध्यक्ष व जिला उपाध्यक्ष भूपेंद्र शर्मा तथा वरिष्ठ नेता डॉ. सत्यप्रकाश आचार्य के भतीजे अरविंद किशोर आचार्य की हार का भी उल्लेख सामने आया है।

हार के पीछे क्या कारण? टिकट बंटवारे से लेकर गुटबाजी तक चर्चा

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस हार के पीछे भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी सबसे बड़ा कारण हो सकती है। टिकट बंटवारे में कार्यकर्ताओं की अनदेखी, बागियों को मनाने में नाकामी और संगठन के भीतर आपसी खींचतान जैसे मुद्दों की चर्चा हो रही है। हालांकि, इन कारणों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

कुल मिलाकर, बीकानेर नगर निगम चुनाव-2026 में भाजपा के सामने चुनौती केवल सीटों की हार तक सीमित नहीं है। बड़े नेताओं और संगठन से जुड़े चेहरों की हार ने पार्टी के भीतर आत्ममंथन की जरूरत को सामने ला दिया है। अब देखना होगा कि भाजपा इस चुनावी झटके से क्या सबक लेती है और आने वाले समय में संगठन को किस तरह मजबूत करती है।गिरीश कुमार श्रीमाली



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