

आपणी हथाई न्यूज, बीकानेर जिले के आस्था के सबसे बड़े केंद्रों में शामिल कोडमदेसर भैरूनाथ मंदिर के पीछे स्थित ऐतिहासिक कोडमदेसर तालाब आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। कभी वर्षभर पानी से लबालब रहने वाला यह सैकड़ों वर्षों पुराना तालाब अब पूरी तरह सूख चुका है। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि तालाब की पुरानी दीवारें जगह-जगह से टूट रही हैं और किसी बड़े हादसे की चेतावनी दे रही हैं, लेकिन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की संवेदनाएं मानो पत्थर बन चुकी हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब सात पीढ़ियों से यह तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों और ग्रामीण जीवन की धड़कन रहा है। गर्मियों में जहां दूर-दूर से पशु यहां पानी पीने आते थे, वहीं हजारों पक्षियों का बसेरा भी इसी तालाब के आसपास हुआ करता था। लेकिन आज हालात इतने दर्दनाक हैं कि प्यासे पशु सूखी मिट्टी और दरकती पालों के बीच भटकते नजर आ रहे हैं।
कम्यूनिटी वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष कन्हैयालाल भाटी ने कहा कि पहली बार ऐसा हुआ है जब तालाब पूरी तरह सूख गया हो। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मानसून से पहले तालाब की दीवारों की मरम्मत और जीर्णोद्धार नहीं किया गया तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि दीवारों के गिरने का सीधा खतरा मंदिर परिसर तक पहुंच सकता है, जहां हर रविवार और विशेष अवसरों पर हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
स्थानीय ग्रामीणों में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को लेकर गहरा आक्रोश है। लोगों का आरोप है कि चुनावों के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता अब इस ऐतिहासिक धरोहर की सुध लेने तक नहीं पहुंच रहे। फोटो खिंचवाने और घोषणाएं करने तक सीमित व्यवस्था धरातल पर पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। वर्षों से तालाब के रास्तों पर हुए अतिक्रमण हटाने की मांग उठ रही है, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में कोडमदेसर तालाब सिर्फ इतिहास की किताबों में ही नजर आएगा।
कभी यह तालाब अकाल और भीषण गर्मी के दिनों में ग्रामीणों के लिए जीवनदाता माना जाता था। पशुपालकों की ढाणियां, खेतों के मवेशी और आसमान में उड़ते पक्षी सभी इस जलस्रोत पर निर्भर रहते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि इस तालाब का पानी केवल प्यास नहीं बुझाता था, बल्कि पूरे इलाके की जीवनरेखा माना जाता था। आज उसी तालाब की फटी हुई धरती व्यवस्था की बेरुखी की गवाही दे रही है।
हालांकि संवेदनहीन व्यवस्था के बीच इंसानियत अभी जिंदा है। तालाब सूखने के बाद प्यास से तड़पते जीवों को देखकर कम्यूनिटी वेलफेयर सोसायटी और स्थानीय लोगों ने जनसहयोग से तालाब में छोटी पाल बनाकर टैंकरों से पानी डलवाना शुरू किया है ताकि बारिश आने तक पशु-पक्षियों की प्यास बुझ सके। लेकिन सवाल अब भी वही है — आखिर कब जागेगा प्रशासन? क्या किसी बड़े हादसे या किसी जान के जाने का इंतजार किया जा रहा है?
अतिक्रमण भी बड़ा कारण
सैकड़ों वर्ष पुराने इस तालाब में सदैव पर्याप्त जल रहता था, न केवल पशु-पक्षियों बल्कि ग्रामीणों के लिए भी जरुरत के समय यह तालाब उपयोगी रहा है। तालाब के खाली होने का एक बड़ा कारण तालाब के मार्ग में अतिक्रमण होना भी है। यदि अतिक्रमण हटाए नहीं गए तो तालाब का अस्तित्व ही बचना मुश्किल है।
अब क्षेत्र के लोगों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि जल्द तालाब का जीर्णोद्धार, सफाई और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू नहीं हुई तो जनआंदोलन किया जाएगा और जनसहयोग से इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की मुहिम छेड़ी जाएगी।


