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Exclusive: संभाग के सबसे बड़े अस्पताल पीबीएम हॉस्पिटल में करोड़ों के टेंडरों पर अनियमितताओं के लगें गंभीर आरोप

आपणी हथाई न्यूज,संभाग के सबसे बड़े अस्पताल पीबीएम हॉस्पिट में हाल ही में जारी हुए कैंसर मेडिसिन और जर्नल मेडिसिन के टेंडरों को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। अस्पताल प्रशासन द्वारा जारी इन टेंडरों के चलते अस्पताल प्रशासन पर मिलीभगत व भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं।अस्पताल प्रशासन और क्रय समिति पर पक्षपात तथा मरीजों के हितों की अनदेखी के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं।

आरोप है कि पिछले महीने सिर्फ दस दिनों के भीतर ई-पर्चेज पोर्टल पर 5–5 करोड़ रुपये के दो बड़े टेंडर अपलोड किए गए, जबकि पहले इसी श्रेणी के टेंडर 50–50 करोड़ रुपये तक के हुआ करते थे।आरोप है कि पहले की व्यवस्था में टेंडर को अलग-अलग विभागों में विभाजित किया जाता था और किसी भी दवा के लिए सिंगल मेक की बाध्यता नहीं होती थी। इससे मरीजों के हित में दवाएं किसी भी अधिकृत निर्माता से समय पर उपलब्ध कराई जा सकती थीं।

खास फर्म को लाभ पहुंचाने का आरोप

आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि स्थायी क्रय समिति से जुड़े एक वरिष्ठ चिकित्सक ने कथित तौर पर अपनी पसंदीदा निजी फर्म ‘श्री कृष्णा फार्मास्यूटिकल’ को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से टेंडरों की शर्तें बदलीं।टेंडर का मूल्य 50 करोड़ से घटाकर 5 करोड़ किया गया।नियम के अनुसार टेंडर मूल्य का 33% वार्षिक टर्नओवर होना आवश्यक है, जबकि आरोप है कि संबंधित फर्म का टर्नओवर 2 करोड़ से कम बताया जाता है।टेंडर में ब्लैकलिस्टेड कंपनियों से जुड़े निर्माता की पाबंदी भी नहीं जोड़ी गई। जानकार लोगों का मानना है कि यह स्थिति अन्य बिडर्स को नुकसान पहुंचाती है और प्रतिस्पर्धा कम होने से दवा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

सप्लाई समय घटाने पर भी विरोध

आरोप है कि पिछले वर्षों में दवा निर्माताओं द्वारा सप्लाई के लिए मांगे जाने वाले 24 दिनों के समय को भी कम नहीं किया गया, बल्कि अन्य फर्मों को कम समय में सप्लाई के लिए बाध्य किया गया। इससे अधिकांश कंपनियों को टेंडर प्रक्रिया से बाहर होने का खतरा उत्पन्न हो गया।

अपीलों का दौर शुरू

बताया जा रहा है कि सरदार पटेल मेडिकल कालेज के प्राचार्य, जिनके पास उस समय पीबीएम अधीक्षक का अतिरिक्त चार्ज था, को कई बार विभिन्न कंपनियों द्वारा इन शर्तों के खिलाफ शिकायतें दी गईं, लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ।

शिकायतों के न सुने जाने पर कई फर्मों ने 2500–2600 रुपए शुल्क जमा कर औपचारिक अपीलें दाखिल कीं,आरोप है कि अपील अधिकारी द्वारा कोई सुनवाई नहीं की जा रही है और श्री कृष्णा फर्मास्युटिकल को फायदा पहुंचाने के लिये उन्होने भी चुप्पी धार ली है। अपीलकर्ताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल इतना है कि टेंडर की शर्तें संशोधित हों और अधिक से अधिक पात्र कंपनियों को निष्पक्ष अवसर मिले।

क्रय समिति पर गंभीर आरोप

आरोप है कि अस्पताल की स्थायी क्रय समिति में शामिल एक डॉक्टर पहले भी मई 2025 के “ऑपरेशन सिंदूर” प्रकरण में सवालों के घेरे में रह चुके हैं, जहाँ कथित रूप से 20 लाख की दवा को 60 लाख रुपये में खरीदा गया था।
उस समय चिकित्सा मंत्री द्वारा प्रिंसिपल और सुपरिटेंडेंट के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की गई थी, बावजूद इसके संबंधित डॉक्टर आज भी स्थायी क्रय समिति के सदस्य बने हुए हैं।

यह भी आरोप है कि वर्तमान प्रिंसिपल वरिष्ठ अधिकारियों के नाम का हवाला देकर निर्णयों को प्रभावित करते हैं और विशेष फर्मों को लाभ देने की कोशिश करते हैं।

टेंडर निरस्तीकरण और जांच समिति गठन की मांग

इस पूरे मामले पर अब यह मांग की जा रही है कि दोनों टेंडर तत्काल प्रभाव से निरस्त किए जाएंनिरस्तीकरण के बाद ही संभागीय आयुक्त कार्यालय की कमेटी से मामले की जांच करवाई जाए।कथित रूप से अनियमितता में शामिल क्रय समिति के सदस्यों को समिति से बाहर किया जाए।अस्पताल के राजस्व और मरीजों के हितों को बचाते हुए टेंडर प्रक्रिया को RTPP नियमों के अनुसार पुनः लागू किया जाए।

इस पूरे मामले ने अस्पताल प्रशासन में हलचल पैदा कर दी है, जबकि मरीजों और जनप्रतिनिधियों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। अब सभी की नजर इस मामले के अगले निर्णय पर टिकी हुई है।



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